बिखरे मोती

बिखरे मोतीचल पड़ा था सफ़र पर,
एक दिन मैं अकेला,
कदम थे की उठते गये,
ना था पता मंज़िल का,
डोर थी कोइ कहीं,
खींचे जा रही जो मुझे,
बढ़ चला लिए हाथों में,
अनजान सफ़र पर मैं यूँ ही।

डोर थी वो पतली बहुत,
मोतियो को बिखरते देख,
रुक ना सके मोती मेरे,
गिर पड़े मोती वहीं,
बह गये राहों पर,

Continue reading