ओस की बूँदें

ओस की बूँदें

देख ज़रा तू वो नन्हीं नन्हीं मासूम ओस की बूँदें,
कीमती हैं कितनी वो नन्हीं नन्हीं मासूम ओस की बूँदें,
मुस्कुराती हुई जो सेंकती हैं सूर्य की किरणें सुबह सुबह,
ताकती हैं जो भरी आँखो से ऊँचे फैले नील गगन को।

लगता है जैसे चाहती उड़ जाना छूने उस नील गगन को,
जैसे चाहती है लिपट कर मिट जाना उस नील गगन में,
लगता है जैसे आतुर है अब नील गगन भी मिलन की उस बेला को,
फैला बाहें अपनी पुकारता वो ओस रुपी प्रेमिका को।

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