बिखरे मोती

बिखरे मोतीचल पड़ा था सफ़र पर,
एक दिन मैं अकेला,
कदम थे की उठते गये,
ना था पता मंज़िल का,
डोर थी कोइ कहीं,
खींचे जा रही जो मुझे,
बढ़ चला लिए हाथों में,
अनजान सफ़र पर मैं यूँ ही।

डोर थी वो पतली बहुत,
मोतियो को बिखरते देख,
रुक ना सके मोती मेरे,
गिर पड़े मोती वहीं,
बह गये राहों पर,

सम्भला ना गया हमसे तो अभी,
आंखोँ ने भी ना दिया साथ,
गिर पड़े और बह चले,
छोड़ते नमी आँखों कें साथ।।

पसारी जो बाहें आगे,
बिखरे पड़े थे मोती ऐसे,
हज़ारों इस दुनिया में भरे,
कतरा कतरा टूटती ये ज़िन्दगी,
मोती थे टूटे बहुत।।

देखा जो मैंने ये सब,
मिल गयी मंज़िल मुझे,
उठ चले कदम मेरे,
बढ़ चला भीड़ में अकेला,
पसारे बाहें मैं आगे बढ़ा,
भर लेने को दामन अपना,
समेटने मोती बिखरे पड़े,
समेटने मोती बहे जो कहीं।।।

About Ashutosh Kasera

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